मुहम्मदाबाद गोहना क्षेत्र के प्रेमा मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल से जुड़ा एक मामला इन दिनों इसी वजह से चर्चा में है। डंगौली निवासी रामचंद्र चौहान द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में अस्पताल के तीन डॉक्टरों—डॉ. प्रवीण कुमार मद्धेशिया, डॉ. सुनील कुमार यादव और डॉ. कृष्णा—पर चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाया गया है। न्यायालय के आदेश पर मुकदमा दर्ज होने के बाद अब पूरे मामले की जांच शुरू हो चुकी है।
एक साधारण ऑपरेशन से शुरू हुई दर्दनाक कहानी
एफआईआर के मुताबिक, दिसंबर 2025 में प्रेमा देवी के पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई। जांच कराने पर पित्त की थैली (गॉल ब्लैडर) में पथरी पाई गई। परिवार के अनुसार डॉक्टरों ने इसे सामान्य ऑपरेशन बताते हुए जल्द स्वस्थ होने का भरोसा दिया। 11 दिसंबर को ऑपरेशन किया गया और परिजनों को विश्वास था कि अब मरीज कुछ दिनों में पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगी।
लेकिन ऑपरेशन के बाद घटनाक्रम बिल्कुल अलग दिशा में बढ़ने लगा।
आपरेशन के बाद बिगड़ती गई हालत
शिकायत के अनुसार ऑपरेशन के बाद प्रेमा देवी को राहत मिलने के बजाय शरीर से लगातार बाइल (पित्त) का रिसाव होने लगा। जब परिजनों ने डॉक्टरों से इसकी वजह पूछी तो उन्हें बताया गया कि यह सामान्य प्रक्रिया है और जल्द सब ठीक हो जाएगा। समय बीतता गया लेकिन मरीज की स्थिति सुधरने के बजाय और खराब होती चली गई।
इसके बाद डॉक्टरों ने एमआरसीपी जांच कराने की सलाह दी। जांच के बाद ईआरसीपी कराने की बात कही गई। परिजन आजमगढ़ तक इलाज के लिए दौड़ते रहे। इस दौरान कई बार पेट में जमा बाइल को निकालने की प्रक्रिया भी की गई, लेकिन समस्या समाप्त नहीं हुई।
क्या समय रहते सही निर्णय लिया गया?
एफआईआर में सबसे गंभीर आरोप यही है कि अस्पताल ने मरीज की वास्तविक स्थिति परिजनों से साझा नहीं की। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि समय रहते उन्हें बीमारी की गंभीरता बताकर किसी बड़े अस्पताल के लिए रेफर कर दिया जाता, तो शायद परिणाम कुछ और हो सकता था।
आरोप यह भी है कि संक्रमण लगातार बढ़ता रहा, लेकिन अस्पताल प्रशासन स्थिति को सामान्य बताता रहा। जब हालत अत्यंत गंभीर हो गई तो परिवार को स्वयं मरीज को वाराणसी स्थित बीएचयू ले जाना पड़ा।
बीएचयू तक पहुंचने में हो चुकी थी देर?
एफआईआर के अनुसार 27 दिसंबर 2025 को मरीज को बीएचयू, वाराणसी में भर्ती कराया गया। वहां करीब 24 दिनों तक इलाज चला। शिकायतकर्ता का दावा है कि बीएचयू के चिकित्सकों ने बताया कि लीवर, पित्त की थैली और संबंधित नली में गंभीर क्षति के कारण लगातार बाइल का रिसाव हो रहा था। अंततः 20 जनवरी 2026 को प्रेमा देवी की मृत्यु हो गई।
यही वह बिंदु है, जिसके आधार पर पति ने पहले हुए ऑपरेशन को चिकित्सकीय लापरवाही बताते हुए न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय के आदेश पर दर्ज हुआ मुकदमा
परिजनों का कहना है कि उन्होंने पहले पुलिस और उच्च अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया गया। न्यायालय के निर्देश पर मुहम्मदाबाद गोहना कोतवाली में डॉ. प्रवीण कुमार मद्धेशिया, डॉ. सुनील कुमार यादव और डॉ. कृष्णा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। अब पुलिस मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन संबंधी दस्तावेज, जांच रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय के आधार पर विवेचना कर रही है।
हर जटिलता लापरवाही नहीं होती
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि चिकित्सा विज्ञान में हर ऑपरेशन सफल होने के बावजूद कभी-कभी अप्रत्याशित जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गॉल ब्लैडर सर्जरी के बाद कुछ मामलों में बाइल लीकेज जैसी जटिलता देखने को मिलती है, जिसका समय पर इलाज संभव है। इसलिए केवल जटिलता होने भर से चिकित्सकीय लापरवाही सिद्ध नहीं हो जाती।
इसी कारण कानून भी मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार की प्रक्रिया, विशेषज्ञों की राय और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय करता है।
मरीजों के अधिकार और अस्पतालों की जिम्मेदारी
यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था के कई अहम सवाल भी सामने लाता है। क्या मरीज और उसके परिजनों को इलाज की पूरी जानकारी दी गई? क्या संभावित जोखिम पहले बताए गए? क्या समय पर रेफर किया गया? क्या सभी मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन हुआ? इन सभी सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही मिलेंगे।
निष्कर्ष
प्रेमा देवी की मौत एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। वहीं डॉक्टरों पर लगे आरोप भी बेहद गंभीर हैं। लेकिन न्याय का मूल सिद्धांत यही कहता है कि किसी को दोषी या निर्दोष मानने से पहले निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पुलिस विवेचना, मेडिकल विशेषज्ञों की राय और न्यायालय की प्रक्रिया ही तय करेगी कि यह चिकित्सकीय लापरवाही का मामला है या इलाज के दौरान उत्पन्न हुई दुर्भाग्यपूर्ण चिकित्सकीय जटिलता।
एक बात निश्चित है—इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और मरीजों के अधिकारों पर गंभीर चर्चा को फिर से जीवित कर दिया है। चिकित्सा व्यवस्था में विश्वास तभी मजबूत रहेगा, जब हर मरीज को समय पर सही इलाज, सही जानकारी और न्यायपूर्ण व्यवस्था मिले।
(अस्वीकरण: यह लेख एफआईआर में दर्ज आरोपों एवं उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। इसमें वर्णित आरोपों की पुष्टि पुलिस जांच और न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद ही मानी जाएगी।)

